निखिल श्रीवास्तव की बेहतरीन नज़्म | Nikhil Srivastava Poetry

निखिल श्रीवास्तव की बेहतरीन नज़्म | Nikhil Srivastava Poetry

 

कैदी हूँ मै इन रातों का 

हाँ, कैदी हूँ मै इन रातों का ..
कैदी हूँ तुम्हारी यादो का,
कैदी हूँ , तुम्हारे तुम्हारे झुम्को का जिसे मै अब भी अपने पास रखा हूँ….

एक वक़्त मै तुम्हारे उस उम्र का गुनाहगार हूँ,
जिस उम्र मे तुम्हे एक साथी की जरुरत थी, मेरी जरुरत थी ….
गुनाहगार उस वीरानी रात का भी जिसमे मै तुम्हारे आंखो से काजल के रँग को स्याह कर दिया था….

मै तुम्हारे वक़्त को साथ न ले सका था…और आज मुझे तुम्हारे उसी वक़्त की जरुरत है …
जबकी तुम अब मेरे पास नही हो, दुर हो , बहुत दुर….

हाँ, मैने देखा था तुम्हारी आंखो बिछड़न का दर्द,
शायद वो दर्द अब मेरी आंखो मे मुझे दिखता है….
इस ढलटी रात में, ढलते दिसंबर मे आ जाओ अपने इस गुनाहगार की गुनाहो पर से सर्द रातों का चादर हटाने, मुझे उस कफ़स से मुक्त करने …..
की आ जाओ, फिर से मुझे वक़्त को वो टुकड़ा देने जो कभी मेरे पास था और मै दुर था उससे….

 

वो फिर न आई

उस शाम बाद वो फिर न आई
वो आखिरी शाम थी उसकी और मेरी पहली शाम थी तन्हाई की, उसके संग जिए लम्हे को अपनी आंखो से गिरते बूंद मे देखने की…

उस शाम बाद मै गाव मे उसके घर से सटा छोटे से मन्दिर पर बैठ उसे पन्नो मे उतारना शुरु किया , जहा मुझे सुकून मिलता, उसके इश्क़ की महक आती, उसकी खूसबू आती….

उसने आखिरी मुलाक़ात मे कुछ नही कहा, बस प्रेम की आखिरी निशानी मेरे माथे पर अपने होठों से दिया और उस शाम को उधार कर दिया मेरे नाम, अपने इश्क़ के नाम….

पर किसी ने उसे उस आखिरी शाम को भी नही देखा, पर मेरे माथे पर उसके होठों के निशान थे,…काश की वो झूठ बोल रहे हो।

उसके होने के और मेरे प्रेम के कई पुख्ता सबूत है, उसकी दी हुई अधुरी शाम, उसकी काली, घनी, और लम्बे जुल्फो की महक ….
और ये छोटा सा मन्दिर जहा मै हर शाम चला आता हूँ, उसे देखने

 

दिल नही धडकता ……

 पता है अब पहले की तरह किसी लड़की को देख दिल नही धडकता ……
और दिल धद्के भी तो क्या जवाब दूँगा उसे ……
जब किसी रात वो आयेगी, जब सभी सो रहे होंगे, चारो तरफ सन्नाटा पसरा होगा, और घोर अंधेरो ने सभी को कैद कर लिया होगा और रात का तीसरा पहर चालू होगा …….
वो आयेगी उस अखीरी खत का जवाब देने जो रह गया था बाकी,

फिर मै कैसे किसी से मोहब्बत क्र सकता हू, उसके रहते, कोई और प्यार भी तो नही कर पायेगे उसकी तरह …..
पर जाना था उसे समय से पहले, शायद नियती से तय कर के आई थी वो,
खैर, वो उस रात भी आई जिस रात मुझे किसी और से प्रेम करने का खयाल आया, …..
वो बोली कब तक मेरी यादों को सँजो कर रखोगे, हाँ पता है तुम कितना प्यार करते हो …..
पर मै…..
हाँ, क्या …? बोलो !
फीर उन सभी यादो का क्या, फिर तुम भी नही आओगी मिलने क्युकी तुम्हे सुकून मिल जायेगा मेरा फिर से किसी और की मोहब्बत मे पड़ना….
हाँ, तो कब तक यूँ अकेले रहोगे ….
एक हवा के झोके ने मेरे माथे को चुमा …..दुर कही अन्धेरा छटने लगा था, “वो फिर किसी रात आयेगी इन अधुरी बातो को पुरा करने”
मेरी उंगलियो की गिरह अब खाली हो गई थी, वो जा चुकी थी,
किसी और से मोहब्बत के सवाल को अधुरा छोड़कर ……
#निखिल श्रीवास्तव

वो चली गई थी 

वो चली गई थी, मै उसे रोक नही पाया, एक दर्द था चेहरे पर उसके , बिछड़ने का, खोने का, और एक टीस थी उसके मन जो बाकी रह गई थी……

बचा रह गया था मै, बूढ़ा टूटा छप्पर और बरसात के बाद की कुछ बुंदे,
उसकी यादों के खंडहर अब भी बाकी है इस घर मे,
पर अब भी सुकून बचा है इस घर मे, …..
जितना प्राकृतिक प्रेम था हमारा , उतना ही प्राकृतिक है ये बूढ़ा छप्पर …

इस टूटे छप्पर ने हमारी प्रेम की कहानियाँ देखी है, लम्बी लम्बी राते काटी है हम दोनो इन इसके छप्पर टले …..
उसके जाने के बाद मै मौन हो गया, सिर्फ अब इस घर से बातें किया करता हूँ, खामोशी ओढे…..

उसका जाना आखिरी सत्य था, पर वो जाने के साथ एक दर्द का सैलाब दे गई, वो जानती थी मै टूट जाऊंगा इसलिए उसने विदा लेने से पहले मुझे बताना जरूरी नही समझा था,

मै बूढ़ा हो गया था, बस अब यही मेरा साथी बचा है,
बूढ़ा टूटा छप्पर …..अब बस उसके बिना सुकून की तलाश मे यही बैठ जाता हूँ चबूतरे पर और काट लेता हू जिन्दगी के एक एक दिन ……

 

 


Read More –