Mir Taki Mir Shayari | मीर तकी मीर शायरी

Mir Taki Mir Shayari | मीर तकी मीर शायरी

मीर तकी मीर शायरी

अपने तो होंठ भी न हिले उसके रू-ब-रू
रंजिश की वजह ‘मीर’ वो क्या बात हो गई?

01

आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज
शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज

 

जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं
हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज

 

साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देख
टपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज

 

था जी में उससे मिलिए तो क्या क्या न कहिये ‘मीर’
पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज

 

‘मीर’ साहब भी उसके याँ थे पर
जैसे कोई ग़ुलाम होता है

 

02

बेखुदी ले गयी कहाँ हम को
देर से इंतज़ार है अपना

 

 

रोते फिरते हैं सारी-सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना

 

दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इस में क्या इख्तियार है अपना

 

कुछ नही हम मिसाले-अनका लेक
शहर-शहर इश्तेहार है अपना

 

जिस को तुम आसमान कहते हो
सो दिलों का गुबार है अपना

 

 

हम सोते ही न रह जाएँ ऐ शोरे-क़यामत !
इस राह से निकले तो हमको भी जगा देना

 

03

हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।

 

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।

 

चश्म-ए-दिल खोल इस आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

 

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।

 

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

 

‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।

मस्ती में लग़ज़िश हो गई माज़ूर रक्खा चाहिए
ऐ अहले मस्जिद ! इस तरफ़ आया हूँ मैं भटका हुआ

 

आने में उसले हाल हुआ जाए है तग़ईर
क्या हाल होगा पास से जब यार जाएगा ?

 

बेकसी मुद्दत तलक बरसा की अपनी गोर पर
जो हमारी ख़ाक़ पर से हो के गुज़रा रो गया

 

हम फ़क़ीरों से बेअदाई क्या
आन बैठे जो तुमने प्यार किया

 

सख़्त क़ाफ़िर था जिसने पहले ‘मीर’
मज़हबे-इश्क़ अख़्तियार किया

 

आवारगाने-इश्क़ का पूछा जो मैं निशाँ
मुश्तेग़ुबार ले के सबा ने उड़ा दिया

 

नाहक़ हम मजबूरों पर यह तुहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

 

दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो , ये बस्ती उजाड़कर

 

मर्ग इक मान्दगी का वक़्फ़ा है
यानि आगे चलेंगे दम लेकर

कहते तो हो यूँ कहते , यूँ कहते जो वोह आता
सब कहने की बातें हैं कुछ भी न कहा जाता

 

तड़पै है जबकि सीने में उछले हैं दो-दो हाथ
गर दिल यही है मीर तो आराम हो चुका

 

सरापा आरज़ू होने ने बन्दा कर दिया हमको
वगर्ना हम ख़ुदा थे,गर दिले-बे-मुद्दआ होते

 

एक महरूम चले मीर हमीं आलम से
वर्ना आलम को ज़माने ने दिया क्या-क्या कुछ?

 

हम ख़ाक में मिले तो मिले , लेकिन ऐ सिपहर !
उस शोख़ को भी राह पे लाना ज़रूर था

 

अहदे-जवानी रो-रो काटी, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

 

रख हाथ दिल पर मीर के दरियाफ़्त कर लिया हाल है
रहता है अक्सर यह जवाँ, कुछ इन दिनों बेताब है

 

सुबह तक शम्अ सर को धुनती रही
क्या पतंगे ने इल्तमास किया

 

दाग़े-फ़िराक़ -ओ-हसरते-वस्ल, आरज़ू-ए-शौक़
मैं साथ ज़ेरे-ख़ाक़ भी हंगामा ले गया

शुक्र उसकी जफ़ा का हो न सका
दिल से अपने हमें गिला है यह

 

अपने जी ही ने न चाहा कि पिएँ आबे-हयात
यूँ तो हम मीर उसी चश्मे-पे हुए

 

चमन का नाम सुना था वले न देखा हाय
जहाँ में हमने क़फ़स ही में ज़िन्दगानी की

 

कैसे हैं वे कि जीते हैं सदसाल हम तो ‘मीर’
इस चार दिन की ज़ीस्त में बेज़ार हो गए

 

तुमने जो अपने दिल से भुलाया हमें तो क्या
अपने तईं तो दिल से हमारे भुलाइये

 

परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे
नज़र में सभू की ख़ुदा कर चले

 

यूँ कानों कान गुल ने न जाना चमन में आह
सर लो पटक के हम सरे बाज़ार मर गए

सदकारवाँ वफ़ा है कोई पूछ्ता नहीं
गोया मताए-दिल के ख़रीदार मर गए

 

‘मीर’ बन्दों से काम कब निकला
माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग

 

कहता है कौन तुझको याँ यह न कर तू वोह कर
पर हो सके तो प्यारे दिल में भी टुक जगह कर

 

ताअ़त कोई करै है जब अब्र ज़ोर झूमे ?
गर हो सके तो ज़ाहिद ! उस वक़्त में गुनह कर

 

क्यों तूने आख़िर-आख़िर उस वक़्त मुँह दिखाया
दी जान ‘मीर’ ने जो हसरत से इक निगह कर

 

आगे किसू के क्या करें दस्तेतमअ़ दराज़
ये हाथ सो गया है सिरहाने धरे-धरे

 

न गया ‘मीर’ अपनी किश्ती से
एक भी तख़्ता पार साहिल तक

 

गुल की जफ़ा भी देखी,देखी वफ़ा-ए-बुलबुल
इक मुश्त पर पड़े हैं गुलशन में जा-ए-बुलबुल

 

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
हो गए ख़ाक इन्तिहा है यह

 

पहुँचा न उसकी दाद को मजलिस में कोई रात
मारा बहुत पतंग ने सर शम्अदान पर

 

न मिल ‘मीर’ अबके अमीरों से तू
हुए हैं फ़क़ीर उनकी दौलत से हम

 

काबे जाने से नहीं कुछ शेख़ मुझको इतना शौक़
चाल वो बतला कि मैं दिल में किसी के घर करूँ

 

काबा पहुँचा तो क्या हुआ ऐ शेख़ !
सअई कर,टुक पहुँच किसी दिल तक

 

नहीं दैर अगर ‘मीर’ काबा तो है
हमारा क्या कोई ख़ुदा ही नहीं

 

मैं रोऊँ तुम हँसो हो, क्या जानो ‘मीर’ साहब
दिल आपका किसू से शायद लगा नहीं है

 

काबे में जाँ-ब-लब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
आए हैं फिर के यारो ! अब के ख़ुदा के याँ से

 

छाती जला करे है सोज़े-दरूँ बला है
इक आग-सी रहे है क्या जानिए कि क्या है

 

याराने दैरो-काबा दोनों बुला रहे हैं
अब देखें ‘मीर’ अपना रस्ता किधर बने है

 

क्या चाल ये निकाली होकर जवान तुमने
अब जब चलो दिल पर ठोकर लगा करे है

Mir Taki Mir Shayari | मीर तकी मीर शायरी

 

इक निगह कर के उसने मोल लिया
बिक गए आह, हम भी क्या सस्ते

 

मत ढलक मिज़्गाँ से मेरे यार सर-अश्के-आबदार
मुफ़्त ही जाती रहेगी तेरी मोती-की-सी आब

 

दूर अब बैठते हैं मजलिस में
हम जो तुम से थे पेशतर नज़दीक

 

05

जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
उस की दीवार का सर से मेरे साया न गया

 

दिल के तईं आतिश-ऐ-हिज्राँ से बचाया न गया
घर जला सामने पर हम से बुझाया न गया

 

क्या तुनक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आह
इक दम राज़ मोहब्बत का छुपाया न गया

 

दिल जो दीदार का क़ायेल की बहोत भूका था
इस सितम-कुश्ता से यक ज़ख्म भी खाया न गया

 

शहर-ऐ-दिल आह अजब जाए थी पर उसके गए
ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया ना गया

 

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06
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे-आगे देखिये होता है क्या

 

क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

 

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

 

ये निशान-ऐ-इश्क़ हैं जाते नहीं
दाग़ छाती के अबस धोता है क्या

 

ग़ैरते-युसूफ़ है ये वक़्त ऐ अजीज़
‘मीर’ इस को रायेग़ाँ खोता है क्या

 

07

उलटी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

 

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

 

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

 

सारे रिन्दो-बाश जहाँ के तुझसे सजुद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझको अमान किया

 

सरज़द हम से बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया

 

किसका क़िबला कैसा काबा कौन हरम है क्या अहराम
कूचे के उसके बाशिन्दों ने सबको यहीं से सलाम किया

 

ऐसे आहो-एहरम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सिहर किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझ को राम किया

 

याँ के सपेद-ओ-स्याह में हमको दख़ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया

 

08

न सोचा न समझा न सीखा न जाना
मुझे आ गया ख़ुदबख़ुद दिल लगाना

 

ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना
सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना

 

ज़ुबाँ पर लगी हैं वफ़ाओं कि मुहरें
ख़मोशी मेरी कह रही है फ़साना

 

गुलों तक लगायी तो आसाँ है लेकिन
है दुशवार काँटों से दामन बचाना

 

करो लाख तुम मातम-ए-नौजवानी
प ‘मीर’ अब नहीं आयेगा वोह ज़माना

 

09

जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
तो जीना हमें अपना दुशवार होगा

 

ग़म-ए-हिज्र रखेगा बेताब दिल को
हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा

 

जो अफ़्रात-ए-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़
कोई दिन में बरसों का बिमार होगा

 

उचटती मुलाक़ात कब तक रहेगी
कभू तो तह-ए-दिल से भी यार होगा

 

तुझे देख कर लग गया दिल न जाना
के इस संगदिल से हमें प्यार होगा

 

10

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
हैरती है ये आईना किस का

 

जाने क्या गुल खिलाएगी गुल-रुत
ज़र्द चेह्रा है डर से नर्गिस का

 

शाम ही से बुझा-सा रहता है
दिल हो गोया चराग़ मुफ़लिस का

 

आँख बे-इख़्तियार भर आई
हिज्र सीने में जब तेरा सिसका

 

थे बुरे मुगाबचो के तेवर लेक
शैख़ मयखाने से भला खिसका

 

फ़ैज़ ये अब्र-ए-चश्म-ए-तर से उठा
आज दामन वसीअ है इस का

 

ताब किस को जो हाल-ऐ-‘मीर’ सुने
हाल ही और कुछ है मजलिस का

 

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11
मेहर की तुझसे तवक़्क़ो थी सितमगर निकला
मोम समझे थे तेरे दिल को सो पत्थर निकला

 

दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से के इतना बेताब
किस की तस्कीं के लिये घर से तू बाहर निकला

 

जीते जी आह तेरे कूचे से कोई न फिरा
जो सितमदीदा रहा जाके सो मर कर निकला

 

दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी के न पूछ
जाना जाता है कि इस राह से लश्कर निकला

 

अश्क-ए-तर, क़तरा-ए-ख़ूँ, लख़्त्-ए-जिगर, पारा-ए-दिल
एक से एक अदू आँख से बेहतर निकला

 

हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ अए ‘मीर’
पर तेरा नामा तो एक शौक़ का दफ़्तर निकला

 

12

गुल ब बुलबुल बहार में देखा
एक तुझको हज़ार में देखा

 

जल गया दिल सफ़ेद हैं आखें
यह तो कुछ इंतज़ार में देखा

 

आबले का भी होना दामनगीर
तेरे कूचे के खार में देखा

 

जिन बालाओं को ‘मीर’ सुनते थे
उनको इस रोज़गार में देखा

 

13

कोफ़्त से जान लब पर आई है
हम ने क्या चोट दिल पे खाई है

 

लिखते रुक़ा, लिख गए दफ़्तर
शौक़ ने बात क्या बड़ाई है

 

दीदनी है शिकस्गी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है

 

है तसन्ना के लाल हैं वो लब
यानि इक बात सी बबाई है

 

दिल से नज़दीक और इतना दूर
किस से उसको कुछ आश्नाई है

 

जिस मर्ज़ में के जान जाती है
दिलबरों ही की वो जुदाई है

 

याँ हुए ख़ाक से बराबर हम
वाँ वही नाज़-ए-ख़ुदनुमाई है

 

मर्ग-ए-मजनूँ पे अक़्ल गुम है ‘मीर’
क्या दीवाने ने मौत पाई है

 

14

शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का
अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का

 

दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को
याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का

 

हर सुबह मेरे सर पर इक हादिसा नया है
पैवंद हो ज़मीं का, शेवा इस आसमाँ का

 

कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज्मा की कुछ न पूछो
अहवाल क्या कहूँ मैं, इस मज्लिस-ए-रवाँ का

 

या रोये, या रुलाये, अपनी तो यूँ ही गुज़री
क्या ज़िक्र हम सफ़ीरान याराँ-ए-शादमाँ का

 

क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालिगी की
गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ाख़वाँ का

 

पूछो तो ‘मीर’ से क्या कोई नज़र पड़ा है
चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का

 

15
आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
तो भी हम दिल को मार रखते हैं

 

बर्क़ कम हौसला है, हम भी तो
दिलक एे बेक़रार रखते हैं

 

ग़ैर है मौरीद ए इनायत हाये
हम भी तो तुझ से प्यार रखते हैं

 

न निगह ने पयाम ने वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं

 

हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो
लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं

 

चोटटे दिल की हैं बुतां मशहूर
बस, यही एतबार रखते हैं

 

फिर भी करते हैं ‘मीर’ साहब इश्क़
हैं जवाँ, इख़्तियार रखते

 

16
राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

 

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मेख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

 

क़ाफ़ले में सुबहा के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

 

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़
“मीर” इस को रायगाँ खोता है क्या

 

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17
हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम-थाम लिया

 

ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मयख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतक़ाम लिया

 

वो कज-रविश न मिला मुझसे रास्ते में कभू
न सीधी तरहा से उसने मेरा सलाम लिया

 

मेरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

 

अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में ‘मीर’
प’ मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम किया

 

18

हँसते हो रोते देख कर ग़म से
छेड़ रखी है तुम ने क्या हम से

 

मुँद गई आँख है अँधेरा पाक
रौशनी है सो याँ मिरे दम से

 

तुम जो दिल-ख़्वाह ख़ल्क़ हो हम को
दुश्मनी है तमाम आलम से

 

दरहमी आ गई मिज़ाजों में
आख़िर उन गेसूवान-ए-दिरहम से

 

सब ने जाना कहीं ये आशिक़ है
बह गए अश्क दीदा-ए-नम से

 

मुफ़्त यूँ हाथ से न खो हम को
कहीं पैदा भी होते हैं हम से

 

अक्सर आलात-ए-जौर उस से हुए
आफ़तें आईं उस के मुक़द्दम से

 

देख वे पलकें बर्छियाँ चलियाँ
तेग़ निकली उस अबरू-ए-ख़म से

 

कोई बेगाना गर नहीं मौजूद
मुँह छुपाना ये क्या है फिर हम से

 

वज्ह पर्दे की पोछिए बारे
मलिए उस के कसो जो महरम से

 

दरपय ख़ून ‘मीर’ ही न रहो
हो भी जाता है जुर्म आदम से

 

19

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़

 

इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
सारे आलम में भर रहा है इश्क़

 

इश्क़ है तर्ज़ ओ तौर इश्क़ के तईं
कहीं बंदा कहीं ख़ुदा है इश्क़

 

इश्क़ मा’शूक़ इश्क़ आशिक़ है
या’नी अपना ही मुब्तला है इश्क़

 

गर परस्तिश ख़ुदा की साबित की
किसू सूरत में हो भला है इश्क़

 

दिलकश ऐसा कहाँ है दुश्मन-ए-जाँ
मुद्दई है प मुद्दआ है इश्क़

 

है हमारे भी तौर का आशिक़
जिस किसी को कहीं हुआ है इश्क़

 

कोई ख़्वाहाँ नहीं मोहब्बत का
तू कहे जिंस-ए-ना-रवा है इश्क़

 

‘मीर’-जी ज़र्द होते जाते हो
क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क़

 

20

आज-कल बे-क़रार हैं हम भी
बैठ जा चलने हार हैं हम भी

 

आन में कुछ हैं आन में कुछ हैं
तोह्फ़ा-ए-रोज़गार हैं हम भी

 

मना गिर्या न कर तो ऐ नासेह
इस में बे-इख़्तियार हैं हम भी

 

दरपय जान है क़रावुल मर्ग
कसो के तो शिकार हैं हम भी

 

नाले करियो समझ के ऐ बुलबुल
बाग़ में यक कनार हैं हम भी

 

मुद्दई’ को शराब हम को ज़हर
आक़िबत दोस्त-दार हैं हम भी

 

मुज़्तरिब गिर्या नाक है ये गुल
बर्क़ अब्र-ए-बहार हैं हम भी

 

गर ज़-ख़ुद रफ़्ता हैं तिरे नज़दीक
अपने तो यादगार हैं हम भी

 

‘मीर’ नाम इक जवाँ सुना होगा
उसी आशिक़ के यार हैं हम भ

 


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